Tuesday, September 11, 2018

पंडरकवड़ा से निकलकर यवतमाल ज़िला मुख्

धड़क योजना हमको आसान पड़ती पर उसमें कुंआ मिला नहीं. मनरेगा में तो काम ठीक से होता नहीं. इसलिए कुंआ तो पूरा बना नहीं. क़र्ज़ बढ़ता ही गया. मेरी माँ खेती करती तो मुनाफा नहीं होता. 70 हज़ार निवेश करते तो 45 हज़ार मिलता. नुकसान ही नुकसान. मां परेशान रहती थी. फिर सितम्बर 2015 में उस दिन मैंने मां से पूछा कि कर्ज़ा कैसे चुकाएंगे. मां ने कहा कि वो नया कर्ज़ा लेने की कोशिश करेगी. कुछ नहीं हुआ तो हम अपनी ज़मीन किराए से खेती के लिए दे देंगे. इसी सोच में मैं खाना खाकर गांव में टहलने निकला. लौट के आया तो देखा मां घर में नहीं थी. सब जगह ढूँढा पर मां नहीं मिली. फिर गांव के बाहर के कुंए पर गया. वहां देखा कि मां की चप्पल कुंए के बाहर पड़ी थी”.
शांताबाई की मौत के बाद प्रहलाद को मुआवज़ा में एक लाख रुपये मिले, जिससे उन्होंने अपना कर्ज़ा चुकाया. आज खेती के बारे में पूछने पर उनके चेहरे पर व्यंग्य में डूबी एक हंसी रहती है.
वह मुस्कुराते हुए मुझसे कहते हैं, “मैं अपनी पांच एकड़ ज़मीन अब किराए पर दे देता हूँ. ख़ुद खेती नहीं करता क्योंकि उसमें सिर्फ़ नुकसान है. मुझे रोज़ का 100 रुपया मज़दूरी मिल जाती है, उसी से अपना घर चलाता हूँ”.
अलविदा कहते हुए वह दुख में डूबी आवाज़ में जोड़ते हैं, “ज़मीन के किराए से कर्ज़ा चुका रहा हूँ. खेती करने से क्या होगा? आपके यहां आने और मेरे बारे में लिखने से क्या होगा? किसी भी चीज़ से क्या होगा? अरे मेरे घर मुख्यमंत्री आकर चले गए...फिर भी मेरी किसान माँ ने आत्महत्या कर ली. मुख्यमंत्री के आने से जब कुछ नहीं हुआ फिर किसी भी बात से क्या हो जाएगा?”
गांव छोड़ने से पहले मेरी मुलाक़ात गांव के युवा सरपंच मंगेश शंकर ज़हरीले से होती है. गांव में बढ़ती किसान आत्महत्याओं के बारे में पूछने पर वह ग़ुस्से में कहते हैं, “मुख्यमंत्री गांव में आए और सिर्फ़ पेपरबाज़ी और नाश्ता करके चले गए. मुख्यमंत्री के गांव को गोद लेने के बाद भी काम क्या हुआ- एक सड़क और एक बस स्टैंड. किसानों को जिस मदद की ज़रूरत थी, वह तो मिली ही नहीं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से तो मैं इतना दुखी हूं कि अब शिकायत भी नहीं करना चाहता. चुनाव से पहले उन्होंने वादा किया था कि सब किसानों का कर्ज़ा माफ़ करेंगे. अभी तक नहीं हुआ. इस गांव में 42 किसानों ने जान दी पर अब तक सिर्फ़ 12 परिवारों को ‘किसान आत्महत्या’ परिवारों को मिलने वाले लाभ मिले. बाक़ी को कागज पर सरकार ने माना ही नहीं. सिर्फ़ चाय पर चर्चा करने से किसान की समस्या ख़त्म नहीं हो जाती”.
यवतमाल गांव में मेरी मुलाक़ात क्षेत्र में किसानों के मुद्दों पर बीते एक दशक से काम कर रहे देवेंद्र राव पवार से होती है.
विदर्भ में कभी न ख़त्म होने वाली किसान आत्महत्याओं के सिलसिले के बारे में वह कहते हैं, “शर्म की बात है कि हरित क्रांति के जनक वसंत राव नाइक का ज़िला आज किसानों की क़ब्रगाह में तब्दील हो गया है. 20 मार्च 2014 को नरेंद्र मोदी यहां आए थे. उन्होंने यहां से किसानों से वादा किया कि अगर उनकी सरकार आएगी तो वह स्वामीनाथन कमीशन की सिफ़ारिशें लागू करेंगे और किसानों को 50 फीसदी मुनाफ़े पर न्यूनतम समर्थन मूल्य दिलवाएंगे. उन्होंने कहा था कि उनके शासन में एक भी किसान आत्महत्या नहीं करेगा. लोगों ने भरोसा करके उनको चुना पर नतीजा क्या हुआ? साल में जितने दिन होते हैं, उससे भी ज़्यादा किसान यवतमाल में हर साल आत्महत्या कर रहे हैं”.
देवेंद्र ने क़र्ज़माफ़ी के लिए हाल ही में शुरू की गई महाराष्ट्र सरकार की ‘छत्रपति शिवाजी महाराज शेतकर (किसान) सम्मान योजना’ का ज़िक्र भी किया. इस योजना के तहत जिन भी किसानों ने 1.5 लाख या उससे कम क़र्ज़ लिया है, उसे माफ़ किए जाने का प्रावधान है. लेकिन कागज़ों पर जन-कल्याण का मोती लगने वाली इस योजना का ज़मीन पर पालन नहीं हो रहा है.
ताज़ा उदाहरण यवतमाल के पंडरकवड़ा तहसील के वागधा गांव में रहने वाला रेणुका चौहाण का परिवार है. अपनी पांच एकड़ ज़मीन पर खेती कर अपने परिवार का भरण पोषण करने वाली महिला किसान रेणुका चौहाण ने मई 2018 में ज़हर खाकर ख़ुदकुशी कर ली. उनके परिवार में उनके 3 बेटे, पति और विकलांग सास-ससुर हैं. रेणुका की मृत्यु के बाद से उनके पति भी अपनी मानसिक स्थिरता खो बैठे हैं.
रेणुका के परिवार ने खेती के लिए 60 हज़ार रुपये का क़र्ज़ लिया था लेकिन फ़सल में कीड़े लग जाने की वजह से वो कर्ज़ चुका नहीं पाए. ‘छत्रपति शिवाजी महाराज शेतकर सम्मान योजना’ के तहत जब वह अपने कर्ज़ माफ़ी की गुहार लेकर कलेक्ट्रेट गयीं तब उसका सिर्फ़ 15 हज़ार क़र्ज़ माफ़ किया गया.
रेणुका के सबसे बड़े बेटे अंकुश बताते हैं, “कागज़ों पर हमारा क़र्ज़ा माफ़ हो चुका था जबकि असलियत में हम पर अब भी 45 हज़ार क़र्ज़ था. जिन माइक्रो फ़ाइनेंस कम्पनियों से हमने क़र्ज़ लिया था उनके लोग घर आकर पैसे के लिए मां को सताते थे. मां को दुःख होता पर दुःख से ज़्यादा शर्म आती. अगर शिवाजी स्कीम के मुताबिक़ हमारा पूरा पैसा माफ़ हो जाता तो शायद मां बच जाती”.
जब हमने अंकुश के घर से विदा ली तब तेज़ बरसात हो रही थी. अपने छोटे से घर की छत में बने सुरागों से गिरते पानी को देखते हुए अंकुश का चेहरा अपने अनिश्चित भविष्य की तरह ही अनिश्चित लग रहा था.
पंडरकवड़ा से निकलकर यवतमाल ज़िला मुख्यालय के कलेक्ट्रेट दफ़्तर में हम अब तक इकट्ठा हुए सवालों के जवाब ढूंढने पहुंचे. यहां पदस्त रेसीडेंट डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर नरेंद्र फुलझले शिवाजी महाराज के नाम पर शुरू की गयी कर्ज़ माफ़ी योजना के ठीक से लागू न किए जाने के बारे में पूछने पर ‘बलिराजा चेतना अभियान’ और ‘प्रेरणा प्रकल्प’ नामक दो नई सरकारी योजनाओं का ज़िक्र करते हैं.
यह दो नई योजनाएं महाराष्ट्र सरकार ने किसान कल्याण को बढ़ाने और आत्महत्याओं को रोकने के लिए शुरू की है.

Friday, September 7, 2018

सिखों का धार्मिक स्थल करतापुर साहिब

किस्तान में स्थित इस गुरुद्वारा साहिब के दर्शन के लिए भारतीय सीमा पर बीएसएफ की तरफ से बनाए गए दर्शन स्थल पर बड़ी संख्या में दूर-दूर से श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं. इसका संबंध सिखों के पहले गुरु श्री गुरुनानक देव से जुड़ा है.
गुरुनानक ने रावी नदी के किनारे एक नगर बसाया और यहां खेती कर उन्होंने 'नाम जपो, किरत करो और वंड छको' (नाम जपें, मेहनत करें और बांट कर खाएं) का फलसफा दिया था. इतिहास के अनुसार गुरुनानक देव की तरफ से भाई लहणा जी को गुरु गद्दी भी इसी स्थान पर सौंपी गई थी. जिन्हें दूसरे गुरु अंगद देव के नाम से जाना जाता है और आखिर में गुरुनानक देव ने यहीं पर समाधि ली थी.
सुखदेव सिंह और अवतार सिंह बेदी जो गुरुनानक देव की सोलहवीं पीढ़ी के तौर पर गुरुद्वारा चोला साहिब डेरा बाबा नानक में सेवाएं निभा रहे हैं. उन्होंने बताया, 'करतारपुर साहिब एक ऐसा स्थान है जहां गुरुनानक देव ने अपने जीवन के सत्रह साल, पांच महीने और नौ दिन बिताए हैं और गुरु साहिब का पूरा परिवार का भी करतारपुर साहिब में आकर बस गया था. गुरु साहिब के माता-पिता का देहांत भी यहीं हुआ था.'रतारपुर साहिब कॉरिडोर को खोलने की मांग को लेकर अलग-अलग सिख संगठनों की तरफ से यहां खास दिनों पर बड़ी संख्या में लोग आते हैं और करतारपुर साहिब दर्शन स्थल पर पहुंच कर अरदास की जाती है.
अकाली दल के नेता कुलदीप सिंह वडाला के तरफ से 2001 में 'करतारपुर रावी दर्शन अभिलाखी संस्था' की शुरुआत की गई थी और 13 अप्रैल 2001 के दिन बैसाखी के दिन अरदास की शुरुआत हुई.
जुलाई 2012 में शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी की प्रमुख अवतार सिंह मक्कड़ ने कॉरिडोर खोलने की वकालत करते हुए कहा था कि पाकिस्तान ने 1999 में तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की पाकिस्तान यात्री के वक्त इसे खोलने की पेशकश की थी. लेकिन भारत की तरफ से बात आगे नहीं बढ़ी.
स्थायी कॉरिडोर की मांग करने वालों की मांग उस समय टूट गई जब 2 जुलाई 2017 को शशि थरूर की अध्यक्षता वाले विदेश मामलों की सात सदस्यीय संसदीय समिति के सदस्यों ने इस कॉरिडोर की मांग को रद्द कर दिया था जिसमें यह कहा गया था कि मौजूदा राजनीतिक माहौल इस कॉरिडोर को बनाने के अनुकूल नहीं है.
अमरीका को शक है कि सीरियाई सरकार विद्रोहियों के कब्ज़े वाले इदलिब प्रांत में रसायनिक हमले की तैयारी कर रही है.
सीरिया में अमरीका के नए राजदूत जिम जेफ्री ने हमले की तैयारी के "कई सबूत" होने का दावा किया है.
इदलिब सीरिया में जिहादी गुटों का आखिरी गढ़ है, जिसे सीरिया की बशर अल-असद सरकार जल्द से जल्द अपने नियंत्रण में ले लेना चाहती है.
हालांकि सीरिया की सरकार रसायनिक हथियारों के इस्तेमाल से लगातार इनकार करती रही है.
मंगलवार को रूसी विमानों ने इदलिब के मुहमबल और जदराया में हवाई हमले किए थे जिसमें बच्चों समेत कई लोगों के मारे जाने की खबरें आई थीं.
ताज़ा हमले की तैयारी ऐसे वक्त में की जा रही है जब शुक्रवार को ही रूस, ईरान और तुर्की के बीच सम्मेलन होना है. रूस और ईरान, सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल-असद का समर्थन करते हैं, जबकि तुर्की विद्रोही गुटों के साथ है.
संयुक्त राष्ट्र ने चेतावनी दी है कि इदलिब पर चढ़ाई से मानवीय संकट खड़ा हो सकता है. वहीं तुर्की को डर है कि लड़ाई से प्रभावित इदलिब के लोग तुर्की में घुस जाएंगे.
राजदूत नियुक्त किए जाने के बाद अपने पहले इंटरव्यू में जेफ्री ने कहा, "हमारे पास रासायनिक हमले की तैयारी के कई सबूत हैं. इसलिए हमने चेतावनी जारी की है. अगर हमला किया जाता है तो इसके गंभीर परिणाम देखने को मिलेंगे."
हालांकि जिम जेफ्री ने ये नहीं बताया है कि उनके पास क्या सबूत हैं.
अमरीका के रक्षा मंत्री ने सोमवार को चेतावनी दी कि अगर सीरिया की सरकार अपने सहयोगियों के साथ मिलकर रासायनिक हमला करती है तो अमरीका इसका जवाब देगा.
अप्रैल 2017 में भी इदलिब प्रांत में रासायनिक हमला किया गया था, जिसमें 80 से ज़्यादा लोग मारे गए थे. संयुक्त राष्ट्र और ओपीसीडब्ल्यू ने हमले के पीछे सरकारी सुरक्षाबलों का हाथ होने का भरोसा जताया था. हालांकि सीरिया की सरकार ने हमलों से इनकार किया था.