किस्तान में स्थि
त इस गुरुद्वारा साहिब के दर्शन के लिए भारतीय सीमा पर
बीएसएफ की तरफ से बनाए गए दर्शन स्थल पर बड़ी संख्या में दूर-दूर से
श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं. इसका संबंध सिखों के पहले गुरु श्री गुरुनानक
देव से जुड़ा है.
गुरुनानक ने रावी नदी के किनारे एक नगर बसाया और
यहां खेती कर उन्होंने 'नाम जपो, किरत करो और वंड छको' (नाम जपें, मेहनत
करें और बांट कर खाएं) का फलसफा दिया था. इतिहास के अनुसार गुरुनानक देव की
तरफ से भाई लहणा जी को गुरु गद्दी भी इसी स्थान पर सौंपी गई थी. जिन्हें
दूसरे गुरु अंगद देव के नाम से जाना जाता है और आखिर में गुरुनानक देव ने
यहीं पर
समाधि ली थी.
सुखदेव सिंह और अवतार सिंह बेदी जो गुरुनानक
देव की सोलहवीं पीढ़ी के तौर पर गुरुद्वारा चोला साहिब डेरा बाबा नानक में
सेवाएं निभा रहे हैं. उन्होंने बताया, 'करतारपुर साहिब एक ऐसा स्थान है
जहां गुरुनानक देव ने अपने जीवन के सत्रह साल, पांच महीने और नौ दिन बिताए
हैं और गुरु साहिब का पूरा परिवार का भी करतारपुर साहिब में आकर बस गया था.
गुरु साहिब के माता-पिता का देहांत भी यहीं हुआ था.'रतारपुर साहिब कॉरिडोर को खोलने की मांग को लेकर अलग-अलग सिख संगठनों की
तरफ से यहां खास दिनों पर बड़ी संख्या में लोग आते हैं और करतारपुर साहिब
दर्शन स्थल पर पहुंच कर अरदास की जाती है.
अकाली दल के नेता
कुलदीप सिंह वडाला के तरफ से 2001 में 'करतारपुर रावी दर्शन अभिलाखी संस्था' की
शुरुआत की गई थी और 13 अप्रैल 2001 के दिन बैसाखी के दिन अरदास की शुरुआत
हुई.
जुलाई 2012 में शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी की प्रमुख अवतार सिंह
मक्कड़ ने कॉरिडोर खोलने की वकालत करते हुए कहा था कि पाकिस्तान ने 1999
में तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की पाकिस्तान यात्री
के वक्त इसे खोलने की पेशकश की थी. लेकिन भारत की तरफ से बात आगे नहीं
बढ़ी.
स्थायी कॉरिडोर की मांग करने वालों की मांग उस समय टूट गई जब 2
जुलाई 2017 को शशि थरूर की अध्यक्षता वाले विदेश मामलों की सात सदस्यीय
संसदीय समिति के सदस्यों ने इस कॉरिडोर की मांग को रद्द कर दिया था जिसमें
यह कहा गया था कि मौजूदा राजनीतिक माहौल इस कॉरिडोर को बनाने के अनुकूल
नहीं है.
अमरीका को शक है कि सीरियाई सरकार विद्रोहियों के
कब्ज़े वाले इदलिब प्रांत में रसायनिक हमले की तैयारी कर रही है.
सीरिया में अमरीका के नए राजदूत जिम जेफ्री ने हमले की तैयारी के "कई सबूत" होने का दावा किया है.
इदलिब सीरिया में जिहादी गुटों का आखिरी गढ़ है, जिसे सीरिया की बशर अल-असद सरकार जल्द से जल्द अपने नियंत्रण में ले लेना चाहती है.
हालांकि सीरिया की सरकार रसायनिक हथियारों के इस्तेमाल से लगातार इनकार करती रही है.
मंगलवार
को रूसी विमानों ने इदलिब के मुहमबल और जदराया में हवाई हमले किए थे
जिसमें बच्चों समेत कई लोगों के मारे जाने की खबरें आई थीं.
ताज़ा हमले की तैयारी ऐसे वक्त में की जा रही है जब शुक्रवार को ही रूस,
ईरान और तुर्की के बीच सम्मेलन होना है. रूस और ईरान, सीरिया के
राष्ट्रपति ब
शर अल-असद का समर्थन करते हैं, जबकि तुर्की विद्रोही गुटों के
साथ है.
संयुक्त राष्ट्र ने चेतावनी दी है कि इदलिब पर चढ़ाई से
मानवीय संकट खड़ा हो सकता है. वहीं तुर्की को डर है कि लड़ाई से प्रभावित
इदलिब के लोग तुर्की में घुस जाएंगे.
राजदूत नियुक्त किए जाने के बाद अपने पहले इंटरव्यू में जेफ्री ने कहा,
"हमारे पास रासायनिक हमले की तैयारी के कई सबूत हैं. इसलिए हमने चेतावनी
जारी की है. अगर हमला किया जाता है तो इसके गंभीर परिणाम देखने को
मिलेंगे."
हालांकि जिम जेफ्री ने ये नहीं बता
या है कि उनके पास क्या सबूत हैं.
अमरीका के रक्षा मंत्री ने सोमवार को चेतावनी दी कि अगर सीरिया की सरकार
अपने सहयोगियों के साथ मिलकर रासायनिक हमला करती है तो अमरीका इसका जवाब
देगा.
अप्रैल 2017 में भी इदलिब प्रांत में रासायनिक हमला किया गया
था, जिसमें 80 से ज़्यादा लोग मारे गए थे. संयुक्त राष्ट्र और ओपीसीडब्ल्यू
ने हमले के पीछे सरकारी सुरक्षाबलों का हाथ होने का भरोसा जताया था.
हालांकि सीरिया की सरकार ने हमलों से इनकार
किया था.