Monday, October 15, 2018

已由亚利桑那大学出版社出版发行

在书中,尼尔森概述了当今世界面临的主要环境挑战,包括气候变化,大气、水质和土壤污染,土壤退化和有限资源的过度利用等。他相信,我们在解决这些问题上所做的还是太少,他承认自己对目前的情况“越来越担忧”。

但是,他对年轻一代的确抱有希望。“整个世界正在迎头赶上。我想,若是我们现在建造‘生物圈2号’,就不需要再费那么多口舌来解释为什么这个项目如此重要了。”尼尔森的这本《挑战极限》(  ) 获得了今年的自然保护常青奖章。尼尔森写道,他的乐观主要源于自己在“生物圈2号”中的经历。“[这个项目]告诉我们,任何一个举动,无论多小,都很重要。如果我们放弃了希望,我们就不再有动力积极地做出改变。”

他还探讨了如何通过改变技术来支持、而非破坏自然的想法。他告诉外对话:“我反对‘技术修复’这个理念,因为它意味着被动。我坚决主张通过修复我们的技术来让生命主导一切。”

他还说,相比于技术进步,改变对自然的态度可能更重要。

“我不喜欢‘环境’这个词,因为这个词强调了它是我们人类之外的东西。但是从进化和代谢的角度来看,我们都是自然的一部分。那些不了解自己与生物圈联系的人显然是生活在幻想之中。”

他说,“生物圈2号”的经历让他与身处的世界有了更深的联系。“以前我曾立志要终身从事于环境有益的项目,但那时它只不过是我的一个想法。当你真正认识到从代谢角度来说,自己就是生物圈的一部分的时候,这真令人感到充实而美妙。”

当然,并不是所有人都有机会生活在人造生物群落里。那么我们该如何重建这种联系呢?“我有义务,因为我曾经有幸生活在这样一个系统中,我有义务与人们分享这个经验。从人类角度来看,城市绿化非常重要。一旦你知道有这种联系,并开始接受它、实现它,一切就没那么难了。”

Wednesday, October 3, 2018

重新审视中国“走出去”的全球环境影响

大约20年前,中国就立下了“走出去”的豪言壮志,而去年这一战略真正取得了突破性进展。中国不仅对亚洲基础设施投资银行(    ,简称 )和上海的新开发银行(New Development Bank,又称为金砖国家开发银行)等新晋金融机构提供了充足支持,还对外公布了“一带一路”战略政策相关的一系列贸易、投资和资源开发计划。种种迹象都表明,中国已经对以美元为结算货币的布雷顿森林体系构成了挑战。

正如我此前在另一篇文章所述,中国对亚投行和新开发银行的支持反映了其在世界银行和国际货币基金组织(   ,简称 )等国际组织中难以施展拳脚的现状——这些以西方国家为中心的组织的代表性也日渐成问题;而“一带一路”战略则是为了在欧亚地区(即“丝绸之路经济带”)建立广泛的联系和合作关系,同时拓展海上航线网络(即“21世纪海上丝绸之路”)——这样的思路不仅预示着更加坚定的外交政策,同时也说明中国希望在“新常态”下向新兴市场转移过剩生产力:实现在保持缓慢增长的情况下向高质量可持续发展模式的转变。

为此,我们整理了此前发表的与此相关的一系列文章,汇编成这份全新特刊(点击这里免费下载)。在这份特刊中,我们通过多角度向您展示了中国在世界各地的发展融资、基础设施建设和资源开发等活动所发生的变化,以及这些活动对中国的发展理念造成的影响。

人们常说,中国崛起带来的是“双赢”合作,但在此过程中产生的环境影响却并未得到充分报道。在这个关键时刻,这类问题应得到更多关注。本期特刊汇集了多份报道和分析,并对如下问题进行了详尽解析:为何说中国资本在全球各地(从东欧到巴基斯坦)继续支持燃煤发电事业;中国企业如何卷入莫桑比克、巴西和圭亚那等国的非可持续性甚至是非法的森林采伐活动;中国的燃料补贴为何助长了中国远洋捕鱼船队进行过度捕捞;采掘业主导的开发模式为何使阿富汗陷入持续冲突;以及中国在蒙古资助大坝建设为何令“绿色丝绸之路”遭到质疑。

与此同时,本期特刊中的文章显示,中国的海外活动也展示出一些积极的趋势:比如亚投行( )可能会接受国际化借贷标准,并令人意外地大力欢迎非政府机构的加入——尽管其常驻董事会空缺可能对其未来发展形成挑战;能源企业可能会与海外民间社会合作,提高自身的企业信誉与安全度;中国企业可能会接受全新的最佳实践自愿执行标准;最让期待的就是中国的投资可能能够加速全球低碳转型的脚步。

事实上,中国的确能够改变并重塑全球发展版图,使其朝着良性的方向发展。得益于近年来在可再生能源领域的持续投资,中国已经成为了全球风能和太阳能发电设备生产创新的领军国家。对此,学者约翰·马修斯( )和谭浩最近表示,中国可能由此开创了一个“具有划时代意义的新能源范式”。

据佐菲恩·埃布拉辛( )报道,中国在巴基斯坦的旁遮普省修建了一个10万千瓦的太阳能电厂。这是总额460亿美元的“中巴经济走廊”倡议的首个能源项目,同时也标志着全球最大太阳能电厂计划正式进入试点阶段。我们同时还发现,中国主要粮食进口商通过承诺向国内市场供应可持续的大豆产品,成功成为了抗击拉丁美洲森林采伐的重要力量。

巴黎气候协定签署后,各国都在积极努力对抗气候变化,而中国也重申要在国内打造“生态文明”。在这样的全球背景之下,理解上述案例就显得更加重要。我们希望本期特刊能够帮助大家加深对中国海外投资活动的理解。

Tuesday, September 11, 2018

पंडरकवड़ा से निकलकर यवतमाल ज़िला मुख्

धड़क योजना हमको आसान पड़ती पर उसमें कुंआ मिला नहीं. मनरेगा में तो काम ठीक से होता नहीं. इसलिए कुंआ तो पूरा बना नहीं. क़र्ज़ बढ़ता ही गया. मेरी माँ खेती करती तो मुनाफा नहीं होता. 70 हज़ार निवेश करते तो 45 हज़ार मिलता. नुकसान ही नुकसान. मां परेशान रहती थी. फिर सितम्बर 2015 में उस दिन मैंने मां से पूछा कि कर्ज़ा कैसे चुकाएंगे. मां ने कहा कि वो नया कर्ज़ा लेने की कोशिश करेगी. कुछ नहीं हुआ तो हम अपनी ज़मीन किराए से खेती के लिए दे देंगे. इसी सोच में मैं खाना खाकर गांव में टहलने निकला. लौट के आया तो देखा मां घर में नहीं थी. सब जगह ढूँढा पर मां नहीं मिली. फिर गांव के बाहर के कुंए पर गया. वहां देखा कि मां की चप्पल कुंए के बाहर पड़ी थी”.
शांताबाई की मौत के बाद प्रहलाद को मुआवज़ा में एक लाख रुपये मिले, जिससे उन्होंने अपना कर्ज़ा चुकाया. आज खेती के बारे में पूछने पर उनके चेहरे पर व्यंग्य में डूबी एक हंसी रहती है.
वह मुस्कुराते हुए मुझसे कहते हैं, “मैं अपनी पांच एकड़ ज़मीन अब किराए पर दे देता हूँ. ख़ुद खेती नहीं करता क्योंकि उसमें सिर्फ़ नुकसान है. मुझे रोज़ का 100 रुपया मज़दूरी मिल जाती है, उसी से अपना घर चलाता हूँ”.
अलविदा कहते हुए वह दुख में डूबी आवाज़ में जोड़ते हैं, “ज़मीन के किराए से कर्ज़ा चुका रहा हूँ. खेती करने से क्या होगा? आपके यहां आने और मेरे बारे में लिखने से क्या होगा? किसी भी चीज़ से क्या होगा? अरे मेरे घर मुख्यमंत्री आकर चले गए...फिर भी मेरी किसान माँ ने आत्महत्या कर ली. मुख्यमंत्री के आने से जब कुछ नहीं हुआ फिर किसी भी बात से क्या हो जाएगा?”
गांव छोड़ने से पहले मेरी मुलाक़ात गांव के युवा सरपंच मंगेश शंकर ज़हरीले से होती है. गांव में बढ़ती किसान आत्महत्याओं के बारे में पूछने पर वह ग़ुस्से में कहते हैं, “मुख्यमंत्री गांव में आए और सिर्फ़ पेपरबाज़ी और नाश्ता करके चले गए. मुख्यमंत्री के गांव को गोद लेने के बाद भी काम क्या हुआ- एक सड़क और एक बस स्टैंड. किसानों को जिस मदद की ज़रूरत थी, वह तो मिली ही नहीं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से तो मैं इतना दुखी हूं कि अब शिकायत भी नहीं करना चाहता. चुनाव से पहले उन्होंने वादा किया था कि सब किसानों का कर्ज़ा माफ़ करेंगे. अभी तक नहीं हुआ. इस गांव में 42 किसानों ने जान दी पर अब तक सिर्फ़ 12 परिवारों को ‘किसान आत्महत्या’ परिवारों को मिलने वाले लाभ मिले. बाक़ी को कागज पर सरकार ने माना ही नहीं. सिर्फ़ चाय पर चर्चा करने से किसान की समस्या ख़त्म नहीं हो जाती”.
यवतमाल गांव में मेरी मुलाक़ात क्षेत्र में किसानों के मुद्दों पर बीते एक दशक से काम कर रहे देवेंद्र राव पवार से होती है.
विदर्भ में कभी न ख़त्म होने वाली किसान आत्महत्याओं के सिलसिले के बारे में वह कहते हैं, “शर्म की बात है कि हरित क्रांति के जनक वसंत राव नाइक का ज़िला आज किसानों की क़ब्रगाह में तब्दील हो गया है. 20 मार्च 2014 को नरेंद्र मोदी यहां आए थे. उन्होंने यहां से किसानों से वादा किया कि अगर उनकी सरकार आएगी तो वह स्वामीनाथन कमीशन की सिफ़ारिशें लागू करेंगे और किसानों को 50 फीसदी मुनाफ़े पर न्यूनतम समर्थन मूल्य दिलवाएंगे. उन्होंने कहा था कि उनके शासन में एक भी किसान आत्महत्या नहीं करेगा. लोगों ने भरोसा करके उनको चुना पर नतीजा क्या हुआ? साल में जितने दिन होते हैं, उससे भी ज़्यादा किसान यवतमाल में हर साल आत्महत्या कर रहे हैं”.
देवेंद्र ने क़र्ज़माफ़ी के लिए हाल ही में शुरू की गई महाराष्ट्र सरकार की ‘छत्रपति शिवाजी महाराज शेतकर (किसान) सम्मान योजना’ का ज़िक्र भी किया. इस योजना के तहत जिन भी किसानों ने 1.5 लाख या उससे कम क़र्ज़ लिया है, उसे माफ़ किए जाने का प्रावधान है. लेकिन कागज़ों पर जन-कल्याण का मोती लगने वाली इस योजना का ज़मीन पर पालन नहीं हो रहा है.
ताज़ा उदाहरण यवतमाल के पंडरकवड़ा तहसील के वागधा गांव में रहने वाला रेणुका चौहाण का परिवार है. अपनी पांच एकड़ ज़मीन पर खेती कर अपने परिवार का भरण पोषण करने वाली महिला किसान रेणुका चौहाण ने मई 2018 में ज़हर खाकर ख़ुदकुशी कर ली. उनके परिवार में उनके 3 बेटे, पति और विकलांग सास-ससुर हैं. रेणुका की मृत्यु के बाद से उनके पति भी अपनी मानसिक स्थिरता खो बैठे हैं.
रेणुका के परिवार ने खेती के लिए 60 हज़ार रुपये का क़र्ज़ लिया था लेकिन फ़सल में कीड़े लग जाने की वजह से वो कर्ज़ चुका नहीं पाए. ‘छत्रपति शिवाजी महाराज शेतकर सम्मान योजना’ के तहत जब वह अपने कर्ज़ माफ़ी की गुहार लेकर कलेक्ट्रेट गयीं तब उसका सिर्फ़ 15 हज़ार क़र्ज़ माफ़ किया गया.
रेणुका के सबसे बड़े बेटे अंकुश बताते हैं, “कागज़ों पर हमारा क़र्ज़ा माफ़ हो चुका था जबकि असलियत में हम पर अब भी 45 हज़ार क़र्ज़ था. जिन माइक्रो फ़ाइनेंस कम्पनियों से हमने क़र्ज़ लिया था उनके लोग घर आकर पैसे के लिए मां को सताते थे. मां को दुःख होता पर दुःख से ज़्यादा शर्म आती. अगर शिवाजी स्कीम के मुताबिक़ हमारा पूरा पैसा माफ़ हो जाता तो शायद मां बच जाती”.
जब हमने अंकुश के घर से विदा ली तब तेज़ बरसात हो रही थी. अपने छोटे से घर की छत में बने सुरागों से गिरते पानी को देखते हुए अंकुश का चेहरा अपने अनिश्चित भविष्य की तरह ही अनिश्चित लग रहा था.
पंडरकवड़ा से निकलकर यवतमाल ज़िला मुख्यालय के कलेक्ट्रेट दफ़्तर में हम अब तक इकट्ठा हुए सवालों के जवाब ढूंढने पहुंचे. यहां पदस्त रेसीडेंट डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर नरेंद्र फुलझले शिवाजी महाराज के नाम पर शुरू की गयी कर्ज़ माफ़ी योजना के ठीक से लागू न किए जाने के बारे में पूछने पर ‘बलिराजा चेतना अभियान’ और ‘प्रेरणा प्रकल्प’ नामक दो नई सरकारी योजनाओं का ज़िक्र करते हैं.
यह दो नई योजनाएं महाराष्ट्र सरकार ने किसान कल्याण को बढ़ाने और आत्महत्याओं को रोकने के लिए शुरू की है.

Friday, September 7, 2018

सिखों का धार्मिक स्थल करतापुर साहिब

किस्तान में स्थित इस गुरुद्वारा साहिब के दर्शन के लिए भारतीय सीमा पर बीएसएफ की तरफ से बनाए गए दर्शन स्थल पर बड़ी संख्या में दूर-दूर से श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं. इसका संबंध सिखों के पहले गुरु श्री गुरुनानक देव से जुड़ा है.
गुरुनानक ने रावी नदी के किनारे एक नगर बसाया और यहां खेती कर उन्होंने 'नाम जपो, किरत करो और वंड छको' (नाम जपें, मेहनत करें और बांट कर खाएं) का फलसफा दिया था. इतिहास के अनुसार गुरुनानक देव की तरफ से भाई लहणा जी को गुरु गद्दी भी इसी स्थान पर सौंपी गई थी. जिन्हें दूसरे गुरु अंगद देव के नाम से जाना जाता है और आखिर में गुरुनानक देव ने यहीं पर समाधि ली थी.
सुखदेव सिंह और अवतार सिंह बेदी जो गुरुनानक देव की सोलहवीं पीढ़ी के तौर पर गुरुद्वारा चोला साहिब डेरा बाबा नानक में सेवाएं निभा रहे हैं. उन्होंने बताया, 'करतारपुर साहिब एक ऐसा स्थान है जहां गुरुनानक देव ने अपने जीवन के सत्रह साल, पांच महीने और नौ दिन बिताए हैं और गुरु साहिब का पूरा परिवार का भी करतारपुर साहिब में आकर बस गया था. गुरु साहिब के माता-पिता का देहांत भी यहीं हुआ था.'रतारपुर साहिब कॉरिडोर को खोलने की मांग को लेकर अलग-अलग सिख संगठनों की तरफ से यहां खास दिनों पर बड़ी संख्या में लोग आते हैं और करतारपुर साहिब दर्शन स्थल पर पहुंच कर अरदास की जाती है.
अकाली दल के नेता कुलदीप सिंह वडाला के तरफ से 2001 में 'करतारपुर रावी दर्शन अभिलाखी संस्था' की शुरुआत की गई थी और 13 अप्रैल 2001 के दिन बैसाखी के दिन अरदास की शुरुआत हुई.
जुलाई 2012 में शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी की प्रमुख अवतार सिंह मक्कड़ ने कॉरिडोर खोलने की वकालत करते हुए कहा था कि पाकिस्तान ने 1999 में तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की पाकिस्तान यात्री के वक्त इसे खोलने की पेशकश की थी. लेकिन भारत की तरफ से बात आगे नहीं बढ़ी.
स्थायी कॉरिडोर की मांग करने वालों की मांग उस समय टूट गई जब 2 जुलाई 2017 को शशि थरूर की अध्यक्षता वाले विदेश मामलों की सात सदस्यीय संसदीय समिति के सदस्यों ने इस कॉरिडोर की मांग को रद्द कर दिया था जिसमें यह कहा गया था कि मौजूदा राजनीतिक माहौल इस कॉरिडोर को बनाने के अनुकूल नहीं है.
अमरीका को शक है कि सीरियाई सरकार विद्रोहियों के कब्ज़े वाले इदलिब प्रांत में रसायनिक हमले की तैयारी कर रही है.
सीरिया में अमरीका के नए राजदूत जिम जेफ्री ने हमले की तैयारी के "कई सबूत" होने का दावा किया है.
इदलिब सीरिया में जिहादी गुटों का आखिरी गढ़ है, जिसे सीरिया की बशर अल-असद सरकार जल्द से जल्द अपने नियंत्रण में ले लेना चाहती है.
हालांकि सीरिया की सरकार रसायनिक हथियारों के इस्तेमाल से लगातार इनकार करती रही है.
मंगलवार को रूसी विमानों ने इदलिब के मुहमबल और जदराया में हवाई हमले किए थे जिसमें बच्चों समेत कई लोगों के मारे जाने की खबरें आई थीं.
ताज़ा हमले की तैयारी ऐसे वक्त में की जा रही है जब शुक्रवार को ही रूस, ईरान और तुर्की के बीच सम्मेलन होना है. रूस और ईरान, सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल-असद का समर्थन करते हैं, जबकि तुर्की विद्रोही गुटों के साथ है.
संयुक्त राष्ट्र ने चेतावनी दी है कि इदलिब पर चढ़ाई से मानवीय संकट खड़ा हो सकता है. वहीं तुर्की को डर है कि लड़ाई से प्रभावित इदलिब के लोग तुर्की में घुस जाएंगे.
राजदूत नियुक्त किए जाने के बाद अपने पहले इंटरव्यू में जेफ्री ने कहा, "हमारे पास रासायनिक हमले की तैयारी के कई सबूत हैं. इसलिए हमने चेतावनी जारी की है. अगर हमला किया जाता है तो इसके गंभीर परिणाम देखने को मिलेंगे."
हालांकि जिम जेफ्री ने ये नहीं बताया है कि उनके पास क्या सबूत हैं.
अमरीका के रक्षा मंत्री ने सोमवार को चेतावनी दी कि अगर सीरिया की सरकार अपने सहयोगियों के साथ मिलकर रासायनिक हमला करती है तो अमरीका इसका जवाब देगा.
अप्रैल 2017 में भी इदलिब प्रांत में रासायनिक हमला किया गया था, जिसमें 80 से ज़्यादा लोग मारे गए थे. संयुक्त राष्ट्र और ओपीसीडब्ल्यू ने हमले के पीछे सरकारी सुरक्षाबलों का हाथ होने का भरोसा जताया था. हालांकि सीरिया की सरकार ने हमलों से इनकार किया था.